पुनर्जागरण क्या है? पुनर्जागरण से आप क्या समझते हैं? – Punarjagran

पुनर्जागरण क्या है? (Punarjagran Kya hai)

चौदहवीं सदी से पन्द्रहवीं सदी तक यूरोप के कई देशों में नगरों की संख्या बढ़ रही थी। एक विशेष ‘नगरीय संस्कृति’ विकसित हो रही थी। विशेषकर रोम, वेनिस, फ्लोरेंस के नगर विद्या व कला के केन्द्र बन गए। नगर राजाओं व चर्च से थोड़े मुक्त थे। जितने नगर थे सभी ज्ञान व कला के केन्द्र बन गए। अमीर व अभिजात वर्ग के लोग लेखकों व कलाकारों को आश्रय प्रदान करते थे। छापेखाना का अविष्कार हो जाने से लोगों में जागृति आना शुरू हो गया, विशेषकर जो लोग दूर दराज में रहते थे। पहले हाथ से लिखी पुस्तकें पढ़ते थे जो महँगी हुआ करती थी। लेकिन अब सस्ते दाम में सभी साहित्यों को पढ़ सकते थे।

मध्य युग में रोमन व यूनानी सभ्यता व संस्कृति के अध्ययन की सर्वथा उपेक्षा की गयी, किन्तु मध्ययुग एवं आधुनिक युग के संधिकाल में यूरोपीय विद्वानों ने लैटिन व यूनानी साहित्य का पुनः अध्ययन आरंभ किया। परिणामस्वरूप यूरोप में एक नवीन, स्वतन्त्र तथा व्यापक दृष्टिकोण का विकास हुआ। 1453 ई. में कुस्तुनतुनिया से यूरोप के विभिन्न नगरों में यूनानी विद्वानों के आने के कारण यूनानी व रोमन सभ्यता व संस्कृति के अध्ययन को विशेष प्रोत्साहन मिला। तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया व अनेक यूनानी भागकर इटली व आस-पास के क्षेत्रो में रहने लगे। फलस्वरूप नवीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सृजन हुआ, वह आधुनिक युग के अवतरण का द्योतक था। कई विद्वानों ने रेनेसाँ (पुनर्जागरण) की शरुआत यहीं से अर्थात् 1300-1600 ई. के मध्य में हुए समस्त सांस्कृतिक परिवर्तनों को माना है।

पुनर्जागरण से आप क्या समझते हैं? (Punarjagran Se Aap Kya Samajhate hai)

प्राचीन काल में आर्य संस्कृति के समान लैटिन व यूनानी संस्कृतियाँ भी उच्च व महान समझी जाती थी। लेकिन मध्यकालीन यूरोप यूनानी लैटिन साहित्य को भुलाकर अंधविश्वासों में पड़ गया था। जनता में निराशा व उत्साह हीनता ने जन्म ले लिया था। यूरोप में मध्ययुग सामान्यतया 500 ई. से पन्द्रहवीं सदी के मध्य तक माना जाता है।

यूरोप की जनता में क्रांति आना शुरू हुआ, नवीन विचारों का सृजन हुआ। मध्ययुगीन अंधविश्वास खत्म होने लगे, जनता का जीवन के प्रति मोह उत्पन्न हुआ। सांसारिक सुखों ने भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया।

अंधविश्वासों व कुप्रथाओं का स्थान मानववाद, भौतिकवाद उन्नत आर्थिक व्यवस्था व राष्ट्रवाद ने ले लिया। इतिहासकारों ने इसी सांस्कृतिक परिवर्तन को पुनर्जागरण या रेनेसाँ कहा है।

रेनेसाँ शब्द फ्रांसीसी भाषा का है जिसका अभिप्राय पुनर्जन्म या पुनर्जागरण होता है। रेनेसाँ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इटली के एक विद्वान लेखक वैसरि ने भवन निर्माण व मूर्तिकला में हुए परिवर्तनों के लिए किया। कालान्तर में एक फ्रांसीसी विद्वान दिदरों ने नवीन साहित्य व कला के लिए इस शब्द रेनेसाँ का प्रयोग किया।

पुनर्जागरण का उत्थान लगभग 1300 ई. एवं 1550 ई. के काल में इटली में हुआ, 16 वीं शताब्दी के प्रथम भाग में यह समस्त उत्तरी यूरोप में फैलने लगा। 19 वीं शताब्दी के विद्वानों ने 14 वीं से 15 वीं शताब्दी के मध्य होने वाले परिवर्तनों को पुनर्जागरण का नाम दिया।

स्विट्ज़रलैंड के ब्रेसले विश्वविद्यालय के इतिहासकार जैकब बर्क हार्ट (1818-97 ई.) जो जर्मन इतिहासकार लियों पोल्ड वॉन रैंक के विद्यार्थी थे, ने इस पर विशेष बल दिया। लियोपोल्ड बॉन रैंक आधुनिक इतिहास के कोलम्बस व ऐतिहासिक प्रत्यक्षवाद के जनक माने जाने वाले श्रेष्ठ इतिहासकारों में से एक थे। रैंक ने ही उन्हें बताया कि इतिहासकार का प्रथम उद्देश्य है कि वह राज्यों व राजनीति के बारे में लिखे जिसके लिये वह सरकारी विभागों के कागजात व फाइलों का प्रयोग करें। पर बर्कहार्ट अपने गुरू के सीमित लक्ष्यों से असंतुष्ट थे। उनके अनुसार इतिहास लेखन में राजनीति ही सब नहीं होती। इतिहास का संबंध उतना ही संस्कृति से भी है, जितना राजनीति से।

1860 ई. मे बर्कहार्ट ने दि सिविलाइजेशन ऑफ दि रेनेसाँ इन इटली नामक पुस्तक की रचना की। इसमें उन्होंने साहित्य, वास्तुकला एवं चित्रकला की ओर भी ध्यान आकर्षित किया एवं यह बताया कि चौदहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक इटली के नगरों में किस प्रकार एक ‘मानवतावादी’ संस्कृति ने जन्म लिया था।

यह संस्कृति नए विश्वास पर आधारित थी कि मानव अपने विषय में खुद निर्णय लेने में दक्ष है, आगे बढ़ने में समर्थ ऐसा व्यक्ति, ‘आधुनिक’ था जबकि ‘मध्ययुगीन मानव’ पर चर्च का नियंत्रण था।

पुनर्जागरण कालीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों एवं उनकी कृतियों का संक्षेप में परिचय

लियोनार्दो द विंची (1452 1519 ई.) – इनका जन्म इटली में हुआ था। ये कुशल शिल्पी, चित्रकार, संगीतज्ञ, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक थे। इनकी कृति दि लास्ट सपर तथा मोनालिसा है।

रॉफेल ( 1483 – 1520 ई.) – ये इटली के थे एवं प्रसिद्ध चित्रकार थे। इनके द्वारा बनाया गया प्रमुख चित्र सिस्टाइन मेटोना था। रॉफेल चित्रकार होने के साथ-ही-साथ कवि व वास्तुकार भी थे।

माइकेल एंजिलो (1475 – 1564 ई.) – ये इटली के फ्लोरेंस नगर के निवासी थे। ये मूर्तिकार एवं चित्रकार दोनों ही थे। उनकी प्रमुख कृति— (i) वेटिकन के सिस्टाइन गिरजाघर के दिवारों में चित्र बनाना, (ii) लास्ट जनमेण्ट (अंतिम निर्णय) उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है, (iii) फ्लोरेंस मे विशाल डेविड की मूर्ति का निर्माण, (iv) दी फॉल ऑफ मैन।

दाँते (1265 – 1321 ई.) – ये इटली के फ्लोरेंस नगर के निवासी थे। इनकी प्रसिद्ध कृति मोनाकिंया अर्थात् राजतन्त्र की रचना है, (ii) ‘डिवाइन कॉमेडी’ नामक महाकाव्य। ये एक महानतम कवि तथा साहित्यकारथे ।

विलियम शेक्सपीयर (1564 – 1616 ई.) – ये विश्व के महानतम् साहित्यकार तथा इंग्लैण्ड के निवासी थे। इन्होंने साहित्य लेखन का कार्य 1588 ई. से 1612 ई. तक किया। इनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ एवं रचनाएँ निम्नलिखित हैं- 1 (i) ) रोमियो जूलियट, (ii) द मर्चेन्ट ऑफ वेनिस, (iii) लब्स लेर्क्स लोस्ट, (iv) द जेण्टलमेन ऑफ वेरोमो, (v) जूलियस सीजर, (vi) मेकबेथ, (vii) हेमलेट आदि। इनकी महानतम् कृति हेमलेट मानी जाती है।

सरवेण्टीज ( 1547 – 1616 ई.) – इनका जन्म स्पेन में हुआ था। ये विद्वान तथा लेखक थे। इनकी पुस्तक “डानक्विक्सोट” है। इस पुस्तक में उन्होंने मध्यकालीन शूरता पर व्यंग्य किया है।

डेसिडेरियस इरैस्मस – 1536 ई.) – इनका जन्म हॉलैण्ड के गौडा नामक स्थान में हुआ था। इनकी प्रसिद्ध कृति द प्रेज ऑफ फैली है। इस पुस्तक में उन्होंने धर्माधिकारियों का मजाक उड़ाया व चर्च में व्याप्त बुराइयों पर आघात किया। इनकी अन्य कृतियाँ फोलोक्वीज, हैण्डबुक ऑफ ए क्रिश्चियन सोल्जर आदि हैं। इरैस्मस को प्रबुद्ध 1 किन्तु डरपोक विद्वान कहा जाता है।

पेट्रार्क ( 1304 – 1374 ई.) – इनका जन्म इटली के फ्लोरेंस नगर में हुआ था, इसे मानववाद को पिता कहा है। ये महान कवि, साहित्यकार तथा कानून शास्त्री थे। इनकी प्रमुख कृतियाँ- सोनेट, फेमेलियर, लेटर्स हैं।

थामस मूर ( 1478 – 1535 ई.) – इनका जन्म इंग्लैण्ड में हुआ था। इनकी महत्वपूर्ण कृत्ति यूटोपिया है, जो लेटिन भाषा में लिखी गई है। यूटोपिया का अर्थ कल्पित लोक है। इस पुस्तक में मूर ने तत्कालीन युग के समाज एवं सरकार हास्यपूर्ण आलोचना की है। इसके अतिरिक्त ऐपोलॉजी तथा कोनिकल ऑफ रिचर्ड -III आदि हैं। मूर एक दार्शनिक मानववादी तथा विद्वान व्यक्ति था ।

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